Thursday, February 27, 2014

कुत्‍ता : एक निर्बन्‍ध

(street dog by mahesh verma)
कुत्‍ता एक लोकप्रिय जानवर है. जहां-जहां मनुष्‍य रूपी जानवर ने लोक में अपनी स्‍थापना के लिए प्रिय का वरण किया है, प्रोटेक्‍शन की मर्यादा का उल्‍लंघन करते हुए, कातर कामनाओं के भटकाव में बेलगाम शिुशुओं को जना है, वहां पीछे-पीछे बेसंभाल कुत्‍ते भी चले आये हैं, और स्‍वभावत: सभी प्रोटेक्‍शनों को धता बताते हुए उन्‍होंने अपनी प्रजाति को विशेष घना किया है. ऐसे ही नहीं है कि हमारे समय के लोकप्रिय राजनीतिज्ञ मां.की.गोदी मनुष्‍य, और प्रजाति विशेष की चिंता में घायल, उन्‍मत्‍त जब चीखकर मंच से बोलने लगते हैं, फर्क़ करना मुश्किल हो जाता है कि प्रीतिकर संभाषण की मां को याद कर रहे हैं, या उदात्‍त कुत्‍ते की छवि को जीवंत करने में मार्मिक भौंक से योगदान कर रहे हैं.[1] भौंकते राजश्री जनज्‍वारानी भी हैं, लेकिन वह राजनीति नहीं साहित्‍य में हैं.[2]

जनसाहित्‍य की प्राथमिक शर्त है कि कवि (किंबा लेखक) भौंकता हुआ लिखे भले नहीं, मगर दिखे जब भी, भौंकता हुआ ही दीखे. जैसे कुत्‍ता होने की प्राथमिक शर्त है कि जानवर भौंकने व अपनी दुम हिलाने की काबिलियत में स्‍वयं की पहचान हासिल करे. दीगर बात है कि इस बिगड़े हालातों वाले वक़्त में यह सिर्फ़ राजनीति और साहित्‍य की क्रांतिकारी धारा ही नहीं है जिसने कुत्‍ते की भौंक का एकाधिकार उससे अगवा कर लिया है, ढेरों गुणरत्‍न प्रतिभाधनी हैं जो दुम हिलाने की विविधरंगी शैलियों में निष्‍णात कुत्‍ते को मीलों पीछे छोड़कर यहां वहां जाने कहां-कहां 'दुम हिलाऊ शिरोमणि सम्‍मान' प्राप्‍त कर रहे हैं. जबकि कुत्‍ता कुछ नहीं कर पा रहा. ज्‍यादा से ज्‍यादा घबराकर फिर दुम हिला रहा है.

फिर भी जाने कैसा विलक्षण संयोग है कि मनुष्‍यरूपी जानवर के मनुष्‍यरूपी बच्‍चे जानवररूपी राजनीतिज्ञों व जनसाहित्‍यकारों की उपस्थिति में आमतौर पर शांत रहते, दिखते हुए भी, रह-रहकर भड़कने, खड़कने भले लगते हों, असल भय का एकाधिकार अभी भी उन्‍होंने जानवररूपी जानवर कुत्‍ते को ही दे रखा है.

गली में चुपचाप खड़ा एकटक तुम्‍हें (बच्‍चे को) चुपचाप घूरते रहने के बाद जानवर (कुत्‍ता) बायें पंजे को चुपचाप आगे करके अभी चुपचाप मुंह खोलता भी नहीं कि तुम (बच्‍चा) जानवर (कुत्‍ते) से भी कहीं ज्‍यादा मर्मांतक कर्णछेदी स्‍वरों में भां-भां (भौं-भौं नहीं) की चीत्‍कार ठेलने लगते हो! और यह विशेष कौतुक व केलि का प्रसंग ही समझा जाना चाहिये कि सिर्फ़ बच्‍चे ही नहीं हैं, अपने को बड़ा समझने वाले ढेरों छोटे मनुष्‍यरूपी मनुष्‍य भी हुए, हैं, होते रहेंगे जो कुत्‍ते का मुंह खुलने के पहले ही भय में गुर्राने, अपनी नानी की याद और अपनी अजन्‍मी सारी मौसियों को बुलाने लगते हैं.[3]

इन ललित पंक्तियों के लेखक के साथ इसीलिए अक्‍सर ऐसा घटित हुआ है कि वह गली में जाते-जाते आखिरी क्षण में पलटकर हाईवे की ओर स्‍थानंतरित हो गया है. हाईवे न केवल कुत्‍तामुक्‍त प्रांतर है, ज्‍यादा सिनेमैटिक भी है, जहां अंधेरों में भले मोटर-गाड़ि‍यों के नीचे आकर चिपटा हो जाने के लुभावने आकर्षण बहुतों को अपने मोहपाश में न बांध पाते हों, कुत्‍तों की भौंक और दूर तक भागने की मजबुरियों से तो मनुष्‍यरूपी मनुष्‍य अछूता रह ही सकता है? फिर गली में प्रेम व नफ़रत जैसे गहन मानवीय भावों की अनुभूति के लिए गरदन से लटकने व गाल चूमने के लिए मुहैय्या सिर्फ़ कुत्‍ते ही हो सकते, होते हैं, जबकि हाईवे पर इस सबका फ़ायदा आलिया भट्ट की चमकदार त्‍वचा की संगत में उठाया जा सकता है, उसे अपने पीछे दौड़ाते हुए ए.आर.रहमान के संगीत में गवाया भी जा सकता है. उसके आगे भी गुत्‍थी लूज़ एंड पर छोड़ी जा ही सकती है कि आलिया के इशारों व निज अनुभूतियों के मार्मिक आलिंगन में आदमी मनुष्‍यरूपी मनुष्‍य ही बना रहे, या लपककर, झपटकर कुत्‍तारूपी मनुष्‍यत्‍व की अल्‍लंघ्‍य ऊंचाइयों को जाकर छूने लगे!

अंत में, कुत्‍ते वाले ढेरों गुण (भौंकने व दुम हिलाने की उदात्‍तता से इतर) इन पंक्तियों के लेखक में भी हैं, मगर जाने क्‍या वज़ह है कि लोक का प्रिय तो क्‍या, वह अभी कुत्‍तों के मध्‍य भी प्रियावस्‍था प्राप्‍त करने में असफल रहा है. आपके पास इसका कोई जवाब हो तो कृपया अगली भौंक से मुझे इसकी खबर करें.

[1]. यू-ट्यूब पर देखें, और हालिया अखबारों के फाईलों में पढ़ लें, श्रीयुत मां.की.गोदी के बमौरी, अविरामपुर, बागपत व लाजपत नगर में दिये विविध भौंकाऊ भाषण.
[2]. देखें, राजश्री जनज्‍वारानी का अभी हाल के गये मेले में लोकार्पित काव्‍य-मधुर संचयन, ‘छिन्‍न-छिन्‍न इस समय में भिन्‍न मैं’, व राज्‍यसभा टीवी के लिए दिया गया उनका अभी तक अनरिलीज्‍ड इंटरव्यू.
[3]. देखें, ध.भारती का अंतिम प्रबंध, 'धर्मयुग व अंधायुग का कुहरीला, दर्दीला स्‍मरण', बेनेट कोलमैन एकाग्र प्रकाशन, 1988. 

2 comments:

  1. लाल से उबरे नहीं और पुराना कुत्ता प्रसंग फिर. डर कितने रचनात्मक ढंग से अभिव्यक्त होता है. कि

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  2. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (28.02.2014) को " शिवरात्रि दोहावली ( चर्चा -1537 )" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें, वहाँ आपका स्वागत है। महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएँ।

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